Monday, November 21, 2011

कैसे कहूँ?


कितना कुछ कहना चाहा, पर हिचकिचा कर रह गए,
हर लफ्ज़ बयाँ करना चाहा, पर ख़्वाब सजा कर रह गए,
तुझे खो देने का जो डर था, दिल में छुपा कर रह गए,
तुझे पाने की उम्मीद में, ग़म मुस्कुरा कर सह गए |

तू इन अनकहे लफ़्ज़ों को समझेगी, मैंने सोचा था,
ख़ामोश ज़ुबान की ख़ामोशी सुन लेगी, मैंने सोचा था,
दिल में दबे जज़्बातों को देखेगी, मैंने सोचा था,
यही दिलासा देकर, बेक़रार दिल को मैंने रोका था |

अफ़सोस है इस बात का, दिल की बात न कह पाया,
जो माँगा है मैंने रब से, तुझे बता ना पाया,
तुझे खोने देने का डर, मुझे ऐसे मोड़ पर लाया,
न तू समझी मेरे जज़्बात, न मैंने तुझे समझाया |

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