Sunday, November 13, 2011

अल्फाज़

तू मेरी नही ना मिली मुझे फिर भी तू हर पल करीब है|
तुझे पाना मुमकिन नही ये कैसा मेरा नसीब है?
तेरी धड़कन को अपनी बाहों में छुपाने को जी करता है|
पर अँधेरे में अक्स ढूँढना भी तोह अजीब है|

तेरे दूर होने से मेरी ये ज़िन्दगी भी अधूरी होगी|
हर पल लेता हूँ जो वोह सांस कैसे पूरी होगी|
तुझे मुझसे जुदा करना भी खुदा की कोई मजबूरी होगी|
वरना तेरी ख़ुशी में मेरी अहमियत भी तोह ज़रूरी होगी|

ये खुदा दिल ना बनाता तोह तुझसे प्यार मै कैसे करता|
तेरी हर बात पर मै यूँ ऐतबार कैसे करता|
तेरी मासूमियत कहूँ या मजबूरी रही होगी कोई,
तुने रुकने को ना कहा तोह मै इंतज़ार कैसे करता |

तेरी एक खुसी के खातिर मै अपनी हर जिद को तोड़ देता|
तेरे कहने से मरता नही पर जीना तोह छोड़ देता |

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